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शिक्षा :जीवन की मूल आवश्यकता (ग्रामीण परिपेक्ष में)

Dr. Sushil PATEL Apr 03, 2026
शिक्षा :जीवन की मूल आवश्यकता (ग्रामीण परिपेक्ष में)


आज के आधुनिक युग में शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का साधन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली मूल आवश्यकता बन चुकी है। जिस प्रकार भोजन, वस्त्र और आवास आवश्यक हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य है।


किन्तु ग्रामीण अंचलों में आज भी एक बड़ी चुनौती यह देखने को मिलती है कि अनेक अभिभावक शिक्षा के महत्व के प्रति पूर्णतः जागरूक नहीं हैं। कई बार आर्थिक स्थिति, अशिक्षा, या परंपरागत सोच के कारण वे बच्चों की पढ़ाई को उतनी प्राथमिकता नहीं दे पाते। कुछ अभिभावक यह मान लेते हैं कि जल्दी काम पर लग जाना या घरेलू कार्यों में सहयोग करना ही बच्चों के लिए पर्याप्त है, जबकि शिक्षा उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने की सबसे मजबूत नींव है।


शिक्षा ही वह माध्यम है जो बच्चों को सही-गलत का ज्ञान कराती है, उनके भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न करती है और उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर करती है। एक शिक्षित बालक न केवल अपने परिवार का सहारा बनता है, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देता है।


इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावकों को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया जाए। विद्यालयों, शिक्षकों और समाज के जागरूक नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि वे घर-घर जाकर शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करें और अभिभावकों को यह समझाएं कि आज की शिक्षा ही उनके बच्चों का सुरक्षित और सफल भविष्य सुनिश्चित कर सकती है।


हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित न रहे, बल्कि अभिभावकों की सहभागिता भी उसमें हो। जब माता-पिता स्वयं बच्चों की पढ़ाई में रुचि लेंगे, तब ही वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।


अतः शिक्षा जीवन की मूल आवश्यकता है, और इसे हर बच्चे तक पहुँचाना हम सभी का कर्तव्य है। विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों में जागरूकता बढ़ाकर हम एक सशक्त, शिक्षित और समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं।


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Posted By: Dr. Sushil PATEL

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